आजकल उपराष्ट्रपति चुनाव की घोषणा के बीच एक खबर जिसने सनसनी फ़ैला रखी है उस पर महामहिम राष्ट्रपति जी को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। कहा यह जा रहा है कि उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ जी ने अपने पद से अब तक इस्तीफा नहीं दिया है। जिस इस्तीफा को सार्वजनिक सोशल मीडिया पर किया गया है वह मनगढ़ंत है। धनखड़ जी राष्ट्रपति से मिले ही नहीं इसलिए इस्तीफा की बात झूठी और अविश्वसनीय है। कहा यह जा रहा है कि उनका वायरल टाइप इस्तीफा राष्ट्रपति के पास भेज दिया गया।
वह स्वीकार भी हो गया। अब कौन बताएगा वह सही था या कूट रचित था। उनका विदाई समारोह भी नहीं हुआ। उनके मुख से भी कहीं इस्तीफा देने का कोई संदेश नहीं आया। यकायक वे जिस तरह गायब किए गए वह भी संदेह को पुख्ता करता है।
पिछले दिनों जितनी सहजता से गृहमंत्री अमित शाह उनकी बीमारी की बात बता रहे थे और पार्टी के साथ सम्बंधों की प्रगाढ़ता जता रहे थे। वो छद्म है। धोखा है। सरासर झूठ है। यदि यह सच है और धनखड़ के बीच इतने मज़बूत रिश्ते हैं तो बीमार उपराष्ट्रपति की तबियत का हाल जानने उनके मंत्री गण और मोदी-शाह क्यों नहीं मिले? यह उनकी थोथरेबाजी के सिवा कुछ नहीं। एक ख़बर यह भी आई कि प्रधानमंत्री मोदी गुपचुप उनके गुप्त ठिकाने पर मिले। यह ख़बर दक्षिण से आई। यदि यह मिज़ाजपुर्सी ही थी या स्वास्थ्य देखने की रस्म थी तो फोटोजीवी मोदी की फोटो सामने क्यों नहीं आई? इन सब पैंतरेबाजी से यही लगता है कि वे धनखड़ को शायद अपनी ज़ुबान बंद रखने की हिदायत देने ही गए हों। जो चर्चाओं में हैं।
इसलिए यह कयास सत्य जान पड़ता है कि वह टाईप इस्तीफा उनका नहीं है।
वे सच ना बता दें इसलिए उन्हें गुप्त स्थान पर नज़र बंद किया गया है।
यह सवाल गहराता जा रहा है कि धनखड़ जी आखिरकार कहां हैं और उन्हें छुपाने का सबब क्या है?
ऐसी अविश्वसनीय स्थिति में उस पत्र की जांच अदालत को करनी चाहिए जो राष्ट्रपति के पास भेजा गया।
ये बात तो साफ़ थी कि उपराष्ट्रपति का रवैया कुछ दिनों से सरकार के ख़िलाफ़ था किंतु एक उपराष्ट्रपति को यदि नकली त्यागपत्र के आधार पर हटाकर उसे नज़रबंद किया जाता है। तो वह लोकतांत्रिक इतिहास में एक बदनुमा दाग की तरह है। जब तक उपराष्ट्रपति खुद इस सम्बन्ध में आकर अपना बयान नहीं देते तब तक यह फरेबी सरकार का कारनामा ही माना जाएगा। इसे जल्द से जल्द स्पष्ट करना होगा यदि उन्होंने इस्तीफा स्वत: दिया है या नहीं। यदि नहीं तो बीमार होने के बावजूद वे पद पर माने जाएंगे। यानि तब उपराष्ट्रपति चुनाव का कोई औचित्य नहीं रहेगा।
इस गंभीर मसले पर जिसमें उपराष्ट्रपति गुम हैं उनकी खोजबीन के आदेश शीर्ष अदालत को देना चाहिए ताकि सरकार पर लग रहे आरोप की सत्यता सामने आ सके। चूंकि अभी उनका दो वर्षीय कार्यकाल शेष है।
(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)